प्रकृति एवं संस्कृति का अनूठा संगम है तिरुअनंतपुरम
07 Jun 2017
केरल दक्षिण भारत का ऐसा राज्य है जहां प्रकृति एवं संस्कृति का अनूठा संगम है। हमारे देश की पश्चिमी तट रेखा के साथ लंबाई में विस्तार लिए इस प्रदेश को एक तरफ अरब सागर के नीले जल तो दूसरी ओर पश्चिमी घाट की हरी-भरी पहाड़ियों ने अद्भुत नैसर्गिक सौंदर्य प्रदान किया है। भारतीय मानसून सबसे पहले इस राज्य को प्रभावित करता है। इसलिए यहां की धरती काफी उर्वर है। यहां लौंग, इलायची, काली मिर्च, काजू, केला, धान, कॉफी, चाय और रबर की अच्छी खेती होती है। व्यावसायिक फसलों के कारण ईसा से एक हजार वर्ष पूर्व भी पश्चिमी एशिया से इस क्षेत्र के व्यापारिक संबंध थे। केरल में नारियल एवं ताड़ के वृक्षों की भरमार है। नारियल को केर भी कहा जाता है। कहते हैं केर वृक्षों की बहुतायत के कारण ही इसका नाम केरल पड़ा। केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम है। खूबियां तिरुअनंतपुरम की तिरुअनंतपुरम सात छोटी-छोटी पहाड़ियों पर बसा है। कई सदी पूर्व ये पहाड़ियां हरे-भरे वनों से आच्छादित थीं, जहां कुछ छोटे-छोटे गांव भी थे। एक बार सबसे ऊंची पहाड़ी पर यहां के निवासियों को भगवान विष्णु की दिव्य प्रतिमा मिली। उन्होंने वहीं मंदिर बनाकर प्रतिमा स्थापित कर दी। मंदिर की स्थापना के बाद यहां आबादी बढ़ती गई और धीरे-धीरे इन पहाड़ियों पर एक शहर ने आकार ले लिया। तब यह त्रावनकोर राज्य का हिस्सा था जिसकी राजधानी पद्मनाभपुरम थी। तिरुअनंतपुरम का महत्व 18वीं शताब्दी में तब बढ़ा जब त्रावनकोर के महाराजा ने अपनी राजधानी यहीं स्थानांतरित कर ली। बाद में यहां कुछ महल और इमारतों का निर्माण हुआ। आजादी के बाद जब मालाबार एवं त्रावनकोर को मिलाकर केरल की स्थापना की गई तो तिरुअनंतपुरम को राजधानी बनाया गया। आज भी इस भव्य शहर में नूतन एवं पुरातन का विशिष्ट मेल दिखाई पड़ता है। शहर वैसे तो काफी बड़ा है, किंतु पर्यटकों की गतिविधियों के यहां केवल दो केंद्र हैं। पहला केंद्र रेलवे स्टेशन के आसपास का क्षेत्र है, जहां राज्य का बस स्टैंड, अनेक होटल तथा पर्यटक सूचना केंद्र हैं। दूसरा महात्मा गांधी मार्ग को कहा जा सकता है जिस पर कई दर्शनीय स्थल हैं। आकर्षण का प्रमुख केंद्र यहां का पद्मनाभ स्वामी मंदिर पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि यह मंदिर उसी स्थान पर स्थित है, जहां भगवान विष्णु की प्रतिमा प्राप्त हुई थी। देश में भगवान विष्णु को समर्पित 108 दिव्य देशम मंदिर हैं। यह उनमें से एक है। त्रावनकोर के महाराजा मार्तड वर्मा ने 1733 में इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। इस भव्य मंदिर का सप्त सोपान स्वरूप अपने शिल्प सौंदर्य से दूर से ही प्रभावित करता है। इसका वास्तुशिल्प द्रविड़ एवं केरल शैली का मिला-जुला रूप है। मंदिर का गोपुरम द्रविड़ शैली में बना है। 30 मीटर ऊंचा गोपुरम बहुसंख्यक शिल्पों से सुसज्जित है। मंदिर के सामने एक विस्तृत सरोवर है। जिसे पद्मतीर्थ कुलम कहते हैं। इसके आसपास लाल टाइल्स यानी खपरैल की छत के सुंदर घर हैं। ऐसे पुराने घर यहां कई जगह देखने को मिलते हैं। यहां दर्शन के लिए विशेष ड्रेस कोड है। पुरुषों को धोती तथा स्त्रियों को साड़ी पहन कर ही मंदिर में प्रवेश करना होता है। ये परिधान यहां किराए पर मिलते हैं। गर्भगृह में भगवान विष्णु की विशाल प्रतिमा है। यहां भगवान अनंतशैया अर्थात सहस्त्रमुखी शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। शहर का नाम भगवान के अनंत नामक नाग के आधार पर ही पड़ा है। तिरु यानी पवित्र एवं अनंत अर्थात सहस्त्रमुखी नाग तथा पुरम यानी आवास। भगवान विष्णु की विश्राम अवस्था को पद्मानाभ एवं अनंतशयनम् भी कहा जाता है। इस मंदिर में भगवान के दर्शन तीन हिस्सों में होते हैं। पहले द्वार से भगवान विष्णु का मुख एवं सर्प की आकृति दिखती है। दूसरे द्वार से भगवान का मध्यभाग तथा कमल में विराजमान ब्रह्मा नजर आते हैं। तीसरे भाग में भगवान के श्री चरणों के दर्शन होते हैं। गर्भगृह में शिखर पर फहराते ध्वज पर विष्णु के वाहन गरुड़ की आकृति बनी है। मंदिर में एक स्वर्णस्तंभ भी है। मंदिर की दीवारों पर पौराणिक घटनाओं और चरित्रों का मोहक चित्रण है। जो मंदिर को अलग ही भव्यता प्रदान करता है। मंदिर के चारों ओर आयताकार रूप में एक गलियारा है। गलियारे में 324 स्तंभ हैं जिन पर सुंदर नक्काशी की गई है। ग्रेनाइट से बने मंदिर में नक्काशी के अनेक सुंदर उदाहरण देखने को मिलते हैं। मंदिर के निकट ही त्रावनकोर के महाराजा का महल स्थित है। इसका निर्माण महाराजा स्वाति तिरुनल बलराम वर्मा द्वारा कराया गया था। वह एक कवि, संगीतज्ञ एवं समाज सुधारक थे। यह महल त्रावनकोर की पारंपरिक निर्माण शैली का सुंदर नमूना है। महल के एक भाग में कुतिरामलिका पैलेस म्यूजियम दर्शनीय है। इस संग्रहालय में सुंदर चित्र, काष्ठ नक्काशी के नमूने, राज परिवार से संबंधित अनेक मूल्यवान वस्तुएं, काष्ठ प्रतिमाएं, सिक्के आदि प्रदर्शित हैं। लकड़ी से बने महल के दो मंजिला भवन में कई झरोखे एवं खिड़कियां हैं। पर्यटकों के लिए यहां समय-समय पर विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। संग्रहालयों का गढ़ मंदिर क्षेत्र के बाहर महात्मा गांधी मार्ग है, जिसके उत्तरी छोर के निकट संग्रहालय एवं चिड़ियाघर है। वहां पहुंचकर लगता है मानो शहर के मध्य किसी छोटे जंगल में आ गए हैं। संग्रहालय का भवन भारतीय सीरियन वास्तुशैली में बना है जो 1853 में बनाया गया था। संग्रहालय के दुर्लभ संग्रह में शामिल कई चीजें दर्शकों को प्रभावित करती हैं। ऐतिहासिक महत्व की कई वस्तुएं मूर्तियां, आभूषण, हाथी दांत की कलात्मक वस्तुएं तथा 250 वर्ष पुरानी नक्काशी की कला देखते ही बनती है। नेपियर संग्रहालय के निकट ही श्री चित्रा कला दीर्घा है। 1935 में स्थापित इस दीर्घा का भवन भी उत्कृष्ट वास्तुशिल्प वाला है। कलाप्रेमियों के लिए यह कलादीर्घा प्रेरणा का स्त्रोत है। इसके संग्रह में राजा रवि वर्मा, निकोलस रोरिक, स्वेतलोबा, रवींद्रनाथ टैगोर, जैमिनी राय जैसे महान कलाकारों के चित्र देखने को मिलते हैं। इनके अलावा राजपूत एवं मुगल शैली के लघु चित्र तथा तंजौर शैली के चित्र भी प्रदर्शित हैं। ऐसे अमूल्य चित्र संग्रह के साथ ही इस दीर्घा में जापान, चीन, तिब्बत एवं इंडोनेशिया आदि देशों के चित्र भी दर्शनीय हैं। निकट ही प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय है जहां राज्य के प्राकृतिक इतिहास से जुड़ी वस्तुएं देखी जा सकती हैं। यहां जीव-जंतुओं, पक्षी एवं समुद्री प्राणियों का इतिहास भी दर्शाया गया है। हरे-भरे विशाल परिसर में वनस्पति उद्यान एवं चिड़ियाघर भी है। तिरुअनंतपुरम में विज्ञान एवं तकनीक संग्रहालय, जैव तकनीक संग्रहालय, चाचा नेहरू बाल संग्रहालय, प्रियदर्शिनी प्लैनेटोरियम तथा कन्नाकुन्नु महल भी देखने योग्य हैं। शहर की पहचान के रूप में प्रतिष्ठित सचिवालय भवन भी देखने लायक है। यह स़फेद इमारत रोमन वास्तुशैली में निर्मित है। एक जगह मौज-मस्ती की यहां का बेली टूरिस्ट विलेज एक आधुनिक पर्यटन आकर्षण कहा जा सकता है। वेली लगून एवं उसके साथ ही विकसित मनमोहक पार्क एक सुंदर पिकनिक स्पॉट है। यहां के सुंदर लैंडस्केप पर्यटकों को बहुत पसंद आते हैं। वेली झील में वाटर स्पोर्ट्स एवं बोटिंग का आनंद भी लिया जा सकता है। यहां पैडल बोट एवं स्पीड बोट उपलब्ध रहती हैं। हरे-भरे वृक्षों से घिरी झील की सुंदरता हर दिशा से अलग नजर आती है। एक ओर सागरतट के पास वेली झील और अरब सागर का संगम भी नजर आता है। झील से सटे विशाल उद्यान में कुछ झूले भी हैं। यहां बनी कुछ आधुनिक मूर्तियां भी पर्यटकों को अच्छी लगती हैं। झील पर एक हैंगिंग ब्रिज बना है, जिसे पार करते हुए एक अलग ही आनंद आता है। कुछ आगे निकल जाएं तो सागरतट नजर आता है। लेकिन वेली टूरिस्ट विलेज के आकर्षण को छोड़ बहुत कम पर्यटक सागरतट की ओर जाते हैं। शहर से 8 किमी दूर एयरपोर्ट के निकट है शंखमुघम बीच, जहां शाम के समय ही रौनक रहती है। यहां से पर्यटकों को सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य देखने को मिलता है। तट के सामने सड़क के दूसरी ओर एक छोटे से पार्क में जलपरी की मनभावन मूर्ति है। पत्थर की 35 मीटर लंबी इस मूर्ति में लेटी हुई जलपरी मूर्तिशिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण कही जा सकती है। मूर्तिकार ने मत्स्य कन्या के शरीर के उतार-चढ़ावों को इस तरह तराशा है कि वह सजीव लगती है। कोवलम का समुद्रतट तिरुअनंतपुरम की यात्रा कोवलम बीच देखे बिना अधूरी रह जाएगी। शहर से 16 किमी दक्षिण की ओर स्थित कोवलम अपने आपमें संपूर्ण पर्यटन स्थल है। यह भारत के उन गिने-चुने सागरतटों में एक है जो विश्व पर्यटन मानचित्र पर पहचान रखते हैं। कोवलम समुद्रतट की सुंदरता किसी को बांध लेने में सक्षम है। छोटी सी खाड़ी के समान रेतीला तट, बलखाती समुद्री लहरें, कतार से लगी छतरियों के नीचे विश्राम करते सैलानी, तट के छोर पर नजर आता लाइटहाउस, पीछे की ओर लहराते ताड़ के वृक्षों के झुरमुट, छोटे-छोटे सफेद बादलों से सजा नीला आसमान-सब कुछ एक मुकम्मल तस्वीर जैसा लगता है। समुद्री हवाओं के झोंके और लहरों का जबरदस्त शोर कुछ पल में ही एहसास करा देता है कि हम कोई तसवीर नहीं बल्कि वास्तविक दृश्य देख रहे हैं। वास्तव में कोवलम बीच संसार के सुंदरतम समुद्रतटों में से एक है। यह मनमोहक तट तीन छोटी-छोटी अर्द्धचंद्राकार खाड़ियों के रूप में विभाजित है, जिनके किनारों पर छोटे-छोटे चट्टानी टीले स्थित हैं। दक्षिणी छोर के ऊंचे टीले पर एक लाइट हाउस है। तट पर विदेशी पर्यटकों की भरमार रहती है। ठंडे देशों से आए इन लोगों को कोवलम का उन्मुक्त वातावरण बहुत रास आता है। ज्यादातर पर्यटक स्विमिंग कास्टयूम में लेटे हुए सनबाथ का सुख लेते हैं। कोवलम तट पर सुबह के समय मछुआरों की गतिविधियां भी देखने को मिलती हैं। दरअसल यह कभी मछुआरों का छोटा सा गांव होता था। पर्यटन आकर्षण के रूप में इसकी पहचान 1930 में हुई, तब यहां कुछ छोटे होटल खुलने शुरू हो गए। 1930 के दशक में यहां हिप्पियों का हुजूम आने लगा, तब इसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और यहां कई बड़े होटल भी बन गए थे। आज यहां छोटे होटलों से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर के रेसॉर्ट और रेस्टोरेंट भी हैं। यहां कई देशों के व्यंजन एवं सी फूड आसानी से मिलते हैं। इस बीच पर दिन भर रौनक रहती है। तमाम नवविवाहित युगल चट्टानी टीलों पर एकांत में बैठ समुद्री सौंदर्य को निहारते रहते हैं। सूर्य की किरणों के बदलते कोणों के साथ ही पानी रंग बदलता सा लगता है। इसे देखना भी एक अलग अनुभव है। शाम के समय तो एक अलग ही दृश्य नजर आता है। जब सन सेट पॉइंट पर खड़े लोग समुद्र में समाते सूर्य को देखते हैं। आकर्षण आयुर्वेद का कोवलम और तिरुअनंतपुरम आने वाले कई पर्यटक केरल की आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का लाभ उठाने भी आते हैं। दोनों ही जगह कई ऐसे केंद्र हैं जहां पर्यटक प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा रोगों का निदान पा सकते हैं और स्वास्थ्य लाभ कर सकते हैं। इन केंद्रों में दो प्रकार के पद्धतियों से चिकित्सा होती है। इनमें एक है कायाकल्प चिकित्सा, जिसमें शरीर को पूरी तरह निरोगी बनाने का प्रयास किया जाता है। दूसरी है औषधीय चिकित्सा जिसमें रोग विशेष का उपचार किया जाता है। विभिन्न स्वास्थ्य लाभ केंद्रों द्वारा पर्यटकों के लिए अलग-अलग पैकेज घोषित किए जाते हैं। जो कई सप्ताह पूर्व ही बुक हो जाते हैं। इनमें भी विदेशी सैलानियों की अधिक रुचि देखी जाती है। ये केंद्र कोई साधारण मसाज पार्लर नहीं होते। यहां विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा ये उपचार किए जाते हैं। आसपास के दर्शनीय स्थल तिरुअनंतपुरम के आसपास कुछ और दर्शनीय स्थल हैं। इनमें आक्कुलम पर्यटन केंद्र, तिरुवल्लभ नौका विहार, नैय्यर बांध, पद्मानाभपुरम तथा मिनी हिल स्टेशन पोनमुड़ी है। शहर से कुछ ही दूर ऐसे भी कई स्थल हैं जहां सैलानी अरब सागर के बैकवाटर्स में नौका विहार का आनंद ले सकते हैं। नदियों के समान दिखते इन जलमार्गो पर घूमने का अलग ही लुत्फ है। किनारों पर लहलहाते वृक्ष, आसपास दिखते पारंपरिक घर, स्थानीय वेशभूषा में घूमते केरल के लोग, यह सब देख कुछ अनोखा लगता है। तिरुअनंतपुरम में यदि सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने का अवसर मिले तो उसे नहीं गंवाना चाहिए। ऐसे अवसर पर ही यहां का शास्त्रीय नृत्य कथकली देखने को मिल सकता है। वैसे सांस्कृतिक गतिविधियों के यहां कई केंद्र हैं। जिसके कार्यक्रमों की जानकारी होटल या पर्यटन सूचना केंद्र से प्राप्त की जा सकती है। मार्गी एवं सीवीएन कालारी इनमें प्रमुख केंद्र हैं। जहां कोडिअट्टम, कथकली, कृष्णाअट्टम, मोहिनीअट्टम एवं चाक्यारकुट्टु आदि के कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। तिरुअनंतपुरम ऐसे राज्य की राजधानी है जहां की जलवायु वर्ष भर करीब-करीब एक समान रहती है। इसलिए यहां पर्यटन का मौसम कभी नहीं ठहरता। मानसून में जब सामान्य पर्यटक नहीं आते, तब यहां स्वास्थ्य लाभ के उद्देश्य से आने वाले सैलानियों की संख्या बहुत होती है। सामान्य जानकारी भौगोलिक स्थितिः केरल राज्य के दक्षिणी भाग में स्थित तिरुअनंतपुरम एक राजधानी शहर है। इसके पश्चिम में अरब सागर है तथा अन्य दिशाओं में तमिलनाडु राज्य स्थित है। यहां मलयालम एवं अंग्रेजी भाषा बोली जाती है। कब जाएं: सैर-सपाटे के लिए उपयुक्त समय नवंबर से मई तक है। स्वास्थ्य लाभ के उद्देश्य से जून से अक्टूबर के मध्य जाना श्रेयस्कर है। कैसे जाएं: तिरुअनंतपुरम में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। दिल्ली, चेन्नई, गोवा, बंगलौर, मुंबई एवं कोचीन से नियमित उड़ान उपलब्ध है। यहां से कोलंबो, सिंगापुर, दुबई एवं माले के लिए उड़ाने हैं। रेल मार्ग: दिल्ली, मुंबई, गुवाहाटी, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलौर, मदुरई जैसे शहरों से अनेक एक्सप्रेस ट्रेन तिरुअनंतपुरम के लिए उपलब्ध हैं। बस मार्ग: कोचीन, कन्याकुमारी, त्रिचुर, चेन्नई, मदुरई जैसे नजदीकी शहरों से यहां के लिए अच्छी बस सेवाएं हैं। महत्वपूर्ण स्थानों से दूरी: दिल्ली-2780 किमी, मुंबई-1568 किमी, कोलकाता-2468 किमी, चेन्नई-720 किमी, हैदराबाद-1330 किमी, बंगलौर-761 किमी, मदुरई-307 किमी, कोचीन-243 किमी, कन्याकुमारी-87 किमी, कोवलम-16 किमी

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