मैंने नहीं नीतीश कुमार ने छोड़ दी है जदयू की सदस्यता: शरद यादव

नई दिल्ली, 31 अगस्त (धर्म क्रान्ति)। राज्यसभा सदस्यता छोड़ने के संबंध में बढ़ते दबाव के बीच जदयू के बागी नेता शरद यादव ने अपने पत्र में पलटवार करते हुए कहा है कि नीतीश कुमार ने खुद जदयू के बुनियादी सिद्धांतों का त्याग कर दिया है और इस तरह से स्वेच्छा से जदयू की सदस्यता छोड़ दी है। उन्होंने दावा किया कि पार्टी का बहुमत नीतीश कुमार धड़े और भाजपा के साथ गठबंधन का समर्थन नहीं करता है। शरद यादव ने जदयू सांसद कौशलेन्द्र कुमार के पत्र के जवाब में लिखा कि हमने 25 अगस्त को निर्वाचन आयोग के समक्ष याचिका दी है जिसमें चुनाव चिन्ह आदेश 1968 के पैरा 15 के तहत हमने कहा है कि जदयू का बहुमत हमारा समर्थन करता है और इस तरह से जदयू का चुनाव चिन्ह हमें आवंटित किया जाना चाहिए। जदयू के चुनाव चिन्ह को नीतीश कुमार के धड़े को नहीं दिया जाना चाहिए। यह मामला चुनाव आयोग के समक्ष लंबित है। जदयू के बागी नेता ने कहा कि ऐसा लगता है कि पूर्ण रूप से अवसरवादी राजनीति से प्रेरित होकर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले धड़े ने बिहार के लोगों के उस पवित्र भरोसे को तोड़ा है जो लोगों ने जदयू में व्यक्त किया था। नीतीश कुमार और आपने (कौशलेन्द्र कुमार ने) जदयू के बुनियादी सिद्धांतों का त्याग कर दिया है और इस तरह से स्वेच्छा से जदयू की सदस्यता छोड़ दी है। शरद ने कहा कि ऐसे में आपको ऐसा कोई पत्र जारी करने का नैतिक अधिकार नहीं है जो पार्टी के संविधान के खिलाफ हो। उल्लेखनीय है कि जदयू महासचिव केसी त्यागी ने कहा था कि राज्य सभा में पार्टी के नेता आरसीपी सिंह जल्द ही सभापति वेंकैया नायडू को एक पत्र सौंपेगे। इसमें शरद यादव की संसद सदस्यता रद्द करने की बात कही जायेगी। बहरहाल, जदयू के दिशानिर्देशों के विपरीत शरद यादव पटना में लालू प्रसाद की पार्टी राजद की रैली में शामिल हुए थे और आज इंदौर में उनकी ओर से विभिन्न दलों को शामिल करते हुए साझा विरासत कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह पूछे जाने पर कि पार्टी के दिशानिर्देशों के खिलाफ शरद यादव का राजद की रैली में शामिल होना क्या राज्यसभा की सदस्यता के आयोग्य ठहराने का आधार हो सकती है, जाने माने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप ने कहा कि संविधान की 10वीं अनुसूची और दल बदल विरोधी कानून के अनुसार अगर किसी पार्टी का कोई सदस्य अपनी पार्टी के चिन्ह पर चुनाव लड़ता है और अगर वह पार्टी के आदेश के विरूद्ध मतदान करता है या नहीं करता है.... ऐसी स्थिति में उसके खिलाफ अयोग्य ठहराये जाने की याचिका दायर की जा सकती है। उन्होंने कहा कि दूसरी स्थिति में अगर कोई सांसद स्वेच्छा से पार्टी को छोड़ता है, तो उसके खिलाफ अयोग्य ठहराने की कार्रवाई की जा सकती है। अगर उसने इस्तीफा नहीं दिया है तो सवाल होगा कि उसने पार्टी छोड़ी है या नहीं छोड़ी है। कश्यप ने कहा कि ऐसी स्थिति में याचिका पर फैसला राज्यसभा के सभापति करेंगे। हालांकि ऐसे मामलों में राज्यसभा के सभापति का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में होगा।